प्रतिनिधित्व का अभाव आखिर कब तक सहेगा बनवासी समाज? पुलिस की चुप्पी और व्यवस्था की बेरुखी ने छीना सम्मान और अधिकार
लोकतंत्र में मौलिक अधिकारों से वंचित बनवासी/मुसहर समुदाय
सुधीर राय
गाजीपुर/date:25/06/2026
आखिर कब तक अन्याय सहेगा बनवासी समाज ? पुलिस की चुप्पी और व्यवस्था की बेरुखी ने छीना सम्मान और अधिकार !!

देश के संविधान ने हर नागरिक को समान अधिकार दिए हैं। अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम जैसे कठोर कानून भी बनाए गए ताकि समाज के सबसे कमजोर वर्गों को सुरक्षा और न्याय मिल सके। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि बनवासी और मुसहर समाज आज भी अपने ही अधिकारों के लिए संघर्ष करने को मजबूर है।
प्रतिनिधित्व के अभाव और शिक्षा से दूरी ने इस समाज को इतना कमजोर बना दिया है कि आए दिन समाज के युवा, गुंडों, माफियाओं और दबंगों के शोषण का शिकार बन रहे हैं। कहीं ईंट-भट्ठों पर काम करने वाले मजदूरों को अपमानित किया जा रहा है, तो कहीं उन्हें गाली-गलौज और जान से मारने की धमकियां दी जा रही हैं। पंचायत चुनावों के दौरान वोट बैंक की राजनीति में इन गरीब परिवारों को बंधक बनाए जाने तक के आरोप लगते रहे हैं। कई स्थानों पर हालात ऐसे हैं मानो आजादी के 75 वर्षों बाद भी यह समाज बंधुआ मजदूरी की जंजीरों से मुक्त नहीं हो पाया हो।
सवाल पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर भी खड़ा होता है। जब बनवासी समाज का कोई व्यक्ति न्याय की उम्मीद लेकर थाने पहुंचता है, तो उसकी फरियाद को गंभीरता से नहीं लिया जाता। पीड़ितों का कहना है कि दबंगों द्वारा घरों में घुसकर मारपीट, गाली-गलौज और महिलाओं के साथ अभद्रता जैसी घटनाओं के बावजूद मुकदमा दर्ज कराने के लिए उन्हें दर-दर भटकना पड़ता है।
क्या कानून सिर्फ प्रभावशाली लोगों के लिए है ? क्या अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम केवल किताबों के पन्नों तक सीमित रह गया है? यदि किसी समाज की महिलाओं की अस्मिता सुरक्षित नहीं है, युवाओं का भविष्य माफियाओं के हाथों गिरवी है और पुलिस उनकी शिकायत तक सुनने को तैयार नहीं, तो यह केवल उस समाज की नहीं बल्कि पूरे लोकतंत्र की विफलता है।
आज आवश्यकता है कि, प्रशासन इस समाज की पीड़ा को समझे,और यह सुनिश्चित करे कि कानून का संरक्षण समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। अन्यथा विकास और सामाजिक न्याय के तमाम दावे बनवासी बस्तियों की बदहाली के सामने खोखले साबित होते रहेंगे।
अब सवाल सिर्फ बनवासी समाज का नहीं, बल्कि व्यवस्था का है जो समानता और न्याय का दावा तो करती है, लेकिन सबसे कमजोर वर्ग की आवाज सुनने में आज भी असफल दिखाई देती है।